फ्लैशबेक-जब ददुआ का अंत करके फूले नहीं समाये IPS अनन्त देव

हम अपने आसपास कई सफल व्यक्तियों को देखते हैं, चाहे वो बिजनेस मैन के रूप में हों, कोई राजनेता हो या कोई नौकरशाह, लेकिन हर सफलता के पीछे उस व्यक्ति का वो संघर्ष, समर्पण और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को त्यागने के समझौते उसकी उजली व चकाचोंध कार्यप्रणाली के पीछे हमें नजर नहीं आते। 28 साल के अपने पुलिस करियर में करीब 70 से अधिक अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का रिकार्ड बनाने वाले अनंत देव का यहां तक पहुंचने का सफर भी जुनून, जिद और हर चुनौती को भाग्य बनाने की उनकी आदत का ही नतीजा रहा। बीहड़ के कुख्यात डकैत ददुआ के अंत का मैडल उनके सीने को चैड़ा यूं ही नहीं करता है, इसके लिए इस आईपीएस अनन्त देव ने 14 साल की 'अनंत' तपस्या की। जुनून को जिद बना लेने वाले अनंत ने एसटीएफ में रहकर पहले चंबल के कुख्यात डकैत ददुआ के आतंक का अंत किया और इसके एक साल बाद ही डकैत ठोकिया को भी बीहड़ में घुसकर ठोक डाला।


Muzaffarnagar में Best पुलिसिंग 1993 से 2007 तक ददुआ के पीछे रहे अनंत देव साल 1991 में यूपी पुलिस में डीएसपी बने अनंत देव को इटावा में एक 'नेता जी' के नजदीकी माफिया को उठाकर बन्द कर देने के बाद सजा क तौर पर सीओ कोंच बनाकर बांदा चित्रकूट में 1993 में बीहड़ गेस्ट हाउस में कैम्प करा दिया गया। अनंत उस अनुभव को ताजा करते हुए बताते हैं कि उनकी सर्विस के पहली पनिशमेंट के रूप में गेस्ट हाउस के इस ठहराव ने उनको अपनी सर्विस का सबसे बड़ा मोटिव दिया। यहां एसआई कमल यादव से उनकी मुलाकात हुई। उन्हीं के मुंह से बीहड़ के आतंक ददुआ डकैत के बारे में सुना, ददुआ गैंग से मुठभेड़ की उत्सुकता भी बढ़ने लगी। साल 1994 में सीओ अनंत ने ददुआ का सामना कर उसे पकड़ने के लिए जानकारी जुटाने के साथ साथ प्लान बनाना भी शुरू कर दिया था, बड़े अफसरों को भी इसकी जानकारी दी। इसी बीच शासन ने उनका ट्रांसफर आजमगढ़ जनपद में कर दिया। क्षेत्र बदला तो ददुआ आॅपरेशन भी ठंडे बस्ते में चला गया। 2001 में शासन ने उनको डीएसपी से एएसपी रैंक में प्रमोट किया और एसटीएफ में तैनात कर दिया। 2001-02 में बीहड़ में पड़े रहे, ददुआ के खिलाफ आॅपरेशन चलाया, 1993 के बाद ददुआ मिशन पर ये उनको मिला दूसरा अवसर था, जो सफल नहीं हो पाया। चुनाव के बाद उनको बीहड़ से वापस बुलाया और 2003 में एसटीएफ से हटा दिया गया। वो एसटीएफ में रहना चाहते थे, उनको महाराजगंज भेजा गया, ज्वाइन नहीं किया। बाद में नोएडा में एसपी सिटी बना दिया गया। जब वो एसएसपी नवनीत सिकेरा के साथ एसपी सिटी वाराणसी पद पर तैनात थे, तो उनको एसपी जीआरपी (झांसी अनुभाग) बना दिया गया। कई साल बाद पूर्वांचल में पहुंचे तो फिर से ददुआ से सामने की उनकी दबी जिज्ञासा उभरी। उनके सिर पर एक ही जुनून सवार था, ददुआ डकैत को पकड़ना है, ये जुनून कब एक जिद बन गया, खुद उनको भी पता नहीं चल पाया। एसपी जीआरपी झांसी के पद पर छह माह तैनात रहे। अवसर नहीं मिल पाया, प्लान बड़ा था। ददुआ की खबर उनको मिलती रही। इसी बीच कुम्भ मेला आ गया। उनको एसपी जीआरपी इलाहाबाद बना दिया गया, लेकिन उन्होंने एसटीएफ में जाने की इच्छा जाहिर की। चुनावी दौर में ट्रांसफर पर रोक के चलते डीजीपी जी.एल. शर्मा ने उनको नहीं बदला, लेकिन अनंत की जिद के आगे वो भी विवश हुए और एसटीएफ में उनको अटैच कर दिया गया। उनके साथ पीएसी कमांडेंट बाराबंकी आईपीएस अमिताभ यश को एसटीएफ का एसएसपी बनाया गया। जी.एल. शर्मा हटे तो आईपीएस विक्रम सिंह डीजीपी बने, उन्होंने मानिकपुर-पाठा बीहड़ में आॅपरेशन ददुआ को पूरा करने के लिए अमिताभ यश के साथ अनंत को टीम लेकर भेज दिया। मानिकपुर बीहड गेस्ट हाउस में एक साल तक एक बेड पर वो अमिताभ यश के साथ सोये। उनके दल में एके 47 से लैस करीब 22 जवान शामिल थे, लेकिन ददुआ की गंैग में करीब 40-45 कुख्यात डकैत थे, उनके पास भी एके 47 जैसे घातक हथियार रहते थे। फिर वो दिन भी आया, जब इस सुपर काॅप की 'अनंत' तपस्या को विराम मिला। 22 जुलाई 2007 को जब एसएसपी अमिताभ यश की अगुवाई में एएसपी अनंत देव पूरे दलबल के साथ बीहड़ में ददुआ के गैंग की तलाश में कांबिंग कर रहे थे तो ददुआ से सामना हो गया। दोनों ओर से भयंकर फायरिंग हुई और जब तड़तड़ाहट का शोर थमा तो ददुआ के आतंक की कहानी का अंत लिखा जा चुका था।


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